संवाददाता पूर्वांचल एक्सप्रेस न्यूज़
अतुल राय
वाराणसी। गंगा के निर्मली कारण और अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए उसकी सहायक नदियों को भी स्वच्छ और निर्मल बनाना ही होगा। वाराणसी नाम की पहचान देने वाली दोनों नदियों "वरूणा और असि" को पुनर्जीवित किये बिना गंगा का निर्मलीकरण संभव नहीं होगा। इन नदियों का जन सहभागिता और प्रशासनिक इच्छा शक्ति से ही पुनरूद्धार संभव होगा। उक्त बातें नेपाली कोठी नदेसर स्थित साझा संस्कृत मंच के कार्यालय में रविवार को आयोजित बैठक में भिन्न-भिन्न संस्थाओं से आए हुए वक्ताओं ने अपने अपने विचार व्यक्त किये। बैठक में वरूणा नदी पुनरूद्धार संभावनाएं एवं चुनौतियां विषय पर आयोजित बैठक में प्रमुख रूप से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी मुंबई एवं आईआईटी काशी हिंदू विश्वविद्यालय तथा पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट देहरादून के वैज्ञानिक, पर्यावरण के प्रति सचेत नागरिक, पर्यावरण कार्यकर्ता, भू सेवा जल सेवा अभियान के कार्यकर्ता, वरूणा नदी संवाद यात्रा के सदस्य और साझा संस्कृत मंच के सदस्य शामिल रहे। बैठक के पूर्व नदी वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने शास्त्री घाट पर वर्तमान स्थिति का अवलोकन किया। वक्ताओं ने कहा कि मल जल और कचरे को पूरी तरह से रोकना,नदी के उद्गम से संगम तक दोनों किनारो पर सघन हरित पट्टी लगाने और शारदा सहायक से अधिक जल की उपलब्धता से नदी को पुनर्जीवित किया जा सकता है।इसके साथ ही नदी के किनारे के जल स्रोतों कूप, तालाब, पोखर आदि को पुनर्जीवित करना, वर्षा जल का अधिकतम संचय किया जाना आदि भी आवश्यक होगा। इस बैठक में प्रमुख रूप से आईआईटी मुंबई के प्रोफेसर ओम दामानी, आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर प्रदीप कुमार मिश्रा, पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट देहरादून के प्रोफेसर अनिल गौतम,साझा संस्कृत मंच के संयोजक फादर आनंद,वरूणा नदी संवाद यात्रा के संयोजक राम जी यादव,राम जनम,डॉक्टर मोहम्मद आरिफ,रवि शेखर,एकता,सतीश सिंह,राजकुमार,फादर दयाकर,अंशुल अग्रवाल,रोहित,अजय पटेल,नंदलाल मास्टर,अपर्णा,सुरेश प्रताप सिंह,धर्मेंद्र दुबे,प्रेम प्रकाश आदि ने प्रमुख रूप से अपने-अपने विचार व्यक्त किये। बैठक का संचालन वल्लभाचार्य पाण्डेय व धन्यवाद ज्ञापित फादर प्रवीण ने किया।