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यूपी कालेज के राजर्षि सभागार में एक दिवसीय सेमिनार का हुआ आयोजन 

Updated on: 05 June, 2026

संवाददाता पूर्वांचल एक्सप्रेस न्यूज़

 

वाराणसी -- उदय प्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय के राजर्षि सभागार में सोमवार को प्रसिद्ध कथाकार अमरकांत की जन्मशती के अवसर पर एकदिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। यह आयोजन दो सत्रों में आयोजित की गई। संगोष्ठी का शुभारम्भ प्राचार्य प्रो.धर्मेन्द्र कुमार सिंह व अन्य अतिथियों के द्वारा संयुक्त रूप से राजर्षि जी के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन कर कराया गया।स्वागत उद्बोधन में प्राचार्य प्रो. धर्मेन्द्र कुमार सिंह ने कहा कि अमरकांत प्रेमचंद की परंपरा के ऐसे रचनाकार थे जो जिज्ञासु यथार्थवादी थे। उन्होंने डिप्टी कलेक्ट्री, बहादुर, जिंदगी और जोंक जैसी कहानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अमरकांत की लेखनी लोगों को गहराई तक प्रभावित करती है।प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए कथाकार रणेन्द्र कुमार ने कहा कि अमरकांत कहीं भी बहुत लाउड नहीं होते वे धीमी गति से संचालित होते हैं। उन्होंने कहा कि अमरकांत भारतीय मध्य वर्ग की विद्रूपताओं और अंतर विरोधों को चित्रित करते हैं। अपने वक्तव्य में उन्होंने नौकर, समर्थ, हिलता हाथ, हत्यारे जैसी कहानियों की चर्चा करते हुए कहा कि अमरकांत बेरोजगारी, स्त्री जीवन तथा गरीबों के संघर्ष का सशक्त चित्रण करते हैं। बीएचयू हिन्दी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि अमरकांत के कथा साहित्य का स्वर मूलतः पूरबिया स्वर है। वे मध्य भारत के खदबदाते सामाजिक यथार्थ के रचनाकार हैं। उनके यहां भारतीय समाज का बदलता रूप स्पष्ट दिखाई देता है।बीएचयू के प्रो.मनोज कुमार ने कहा कि अमरकांत की कहानियों में सौंदर्य का यथार्थ धीरे-धीरे प्रकट होता है जो किसी एक केंद्र तक सीमित नहीं है। संगोष्ठी के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि अमरकांत की रचना निर्मिति समाजवादी और प्रगतिशील आंदोलन के आदर्शों से रची बसी है। उनका संपूर्ण कथा साहित्य स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों से प्रेरित है।जनकवि शिवकुमार पराग ने कहा कि अमरकांत की कहानियों का फिल्मांकन उत्कृष्ट हो सकता है। मंचासीन बीएचयू हिन्दी विभाग के प्रो.आशीष त्रिपाठी ने कहा कि अमरकांत प्रेमचंद और यशपाल की प्रगतिशील कथा परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लेखक थे। संगोष्ठी के द्वितीय सत्र का संचालन डा.वन्दना चौबे ने तथा धन्यवाद ज्ञापित प्रो.गोरखनाथ पाण्डेय ने किया।इस संगोष्ठी में प्रमुख रूप से डा.सदानन्द सिंह,डा.एमपी सिंह,प्रो.रमेशधर द्विवेदी,प्रो.प्रज्ञा पारमिता,प्रो.अंजू सिंह,डा.मीरा सिंह,प्रो.उपेन्द्र कुमार,डा.चन्द्रशेखर सिंह,डा.संजय श्रीवास्तव,प्रो.सुधीर कुमार शाही,प्रो.सन्तोष कुमार यादव,प्रो.अलकारानी गुप्ता,प्रो.पंकज कुमार सिंह,अजय राय,डा.डीडी सिंह,प्रो.सुधीर कुमार राय,प्रो.रश्मि सिंह,प्रो.रेनू सिंह,डा.प्रदीप कुमार सिंह,डा.मयंक सिंह,डा.जितेन्द्र सिंह,डा.संजीव सिंह,डा.अशोक कुमार सिंह,डा.आनन्द राघव चौबे,डा.अनुराग उपाध्याय,डा.अक्षय कुमार,डा.सत्येन्द्र सिंह,डा.देवेश चन्द्र,डा.वंश गोपाल यादव,डा.बृजेश कुमार सिंह,डा.सतीश प्रताप सिंह,डा.नरेन्द्र सिंह,डा.विकास यादव,डा.सत्य शरण मिश्रा,डा.शिवबचन,डा.विजय कुमार, सहित सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राएं एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

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