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पुलिस थानों में "कारखास" की अनौपचारिक व्यवस्था

04 July, 2026  |  07:31 AM

संवाददाता पूर्वांचल एक्सप्रेस न्यूज़

 

कई पुलिस थानों पर"कारखास"यह पुलिस विभाग की शब्दावली में कोई मान्यता प्राप्त पद नहीं है,लेकिन थाने की आंतरिक कार्यप्रणाली में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। शब्द "कारखाना" से प्रेरित लगता है,क्योंकि यह थाने को एक तरह की "अवैध कमाई की फैक्ट्री" की तरह संचालित करने वाला व्यक्ति होता है।पुलिस की आधिकारिक सूची में "कारखास" नाम का कोई पद नहीं होता।फिर भी,अधिकांश थानों में एक सिपाही,हेड कांस्टेबल,मुंशी या बाहरी प्राइवेट आदमी को यह जिम्मेदारी अनौपचारिक रूप से सौंपी जाती है। अक्सर सादे कपड़ों में रहने वाला यह व्यक्ति थाने का "खासमखास" माना जाता है।थाना क्षेत्र में अवैध या अनौपचारिक वसूली (जैसे अवैध निर्माण, जुआ, शराब की दुकानें, खनन, रेत माफिया या अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों से मिलने वाली रकम) का संग्रह करना इनका कार्य होता।इस रकम का लेखा-जोखा रखना, थाने के दैनिक खर्च (चाय-पानी, वाहन रखरखाव, स्टेशनरी आदि) में उपयोग करना और शेष राशि ऊपरी अधिकारियों तक पहुंचाना।कई थानों में "कारखास" का रुतबा थाना प्रभारी (SHO) से कम नहीं होता। वह दबंगों,अवैध कारोबारियों,पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों से सीधे संपर्क रखता है।कई मामलों में SHO भी उसके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते।यह प्रथा काफी पुरानी है और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश पुलिस थानों में प्रचलित रही है।इसे यूपी पुलिस की एक विशेषता बताया गया है।कई सरकारें आईं-गईं,लेकिन यह अवैध व्यवस्था बनी रही।वर्तमान में पुलिस सुधारों के कारण यह कम हो रही है:पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम वाले शहरों में ऐसे अनौपचारिक प्रथाओं पर अधिक अंकुश है।फिर भी,कुछ थानों में यह छिपकर जारी है।यह व्यवस्था पुलिस की छवि खराब करती है और आम जनता पर अतिरिक्त बोझ डालती है।वसूली के चक्कर में वास्तविक अपराध नियंत्रण प्रभावित होता है।कई विशेषज्ञों का मानना है कि सख्त कार्रवाई और डिजिटलीकरण से इसे पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।"कारखास" पुलिस थाने की एक छिपी हुई "फैक्ट्री" का प्रतीक है, जो अनौपचारिक और अवैध कमाई पर टिकी होती है। बदलते समय और तकनीकी प्रगति के साथ यह प्रथा लुप्तप्राय हो रही है। अच्छे थानों में अब फोकस जनसेवा, अपराध नियंत्रण और कानून व्यवस्था पर है

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